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Wednesday, 28 August 2019
Monday, 16 April 2018
मेरी भावना के स्रोत हैं सूखे
अक्षर अक्षर घायल है
जल रही है मेरी कविता
निः शब्द पढ़े शब्दों से
मैं कैसे गढ़ लूं
एक नयी कविता
प्रिय मैं कैसे गाऊँ प्रेम कविता
दुःख घनेरी दहका है मन
जल रहा है कोमल तन
मां बहनों की इज्जत खतरे में है
लुटे हुए अस्मत पर
मैं कैसे ग़ढ लूं
एक नयी कविता
प्रिय मैं कैसे गाऊँ प्रेम कविता
Ranjana verma
Wednesday, 25 January 2017
हे मां !! ये जीवन तुम पर अर्पण !!
हे मां !! ये जीवन तुम पर अर्पण !!
ये तन तुम्हे समर्पण
टूटे न कभी विश्वास तुझसे
छुटे न कभी राष्ट्रध्वज हाथ से
चुके न कभी ये तन तेरी सेवा से
दे दू जान हँसकर तुम पर
हे मां !! ये जीवन तुम पर अर्पण
पूजा की थाली में लाई हूं
तेरे लिए दीप सजा कर
अपनी प्राणों की बाती जलाकर
कर रही हर सांस -सांस तुझको अभिनंदन
हे मां !! ये जीवन तुम पर अर्पण !!
Ranjana Verma
Monday, 7 November 2016
मैं कर जोडे
विनती करूँ
लिए अर्घ्य की धार
निर्जला जल में खड़ी
करूँ प्रणाम तुम्हें बारम्बार
हे सूर्यदेव ! जग के प्राणाधार !!
दीर्घायु हो संतान
और झिलमिलाता रहे
मांग का सिंदूर
मांग रही आशीर्वाद
विश्व -शांति का और
भरा रहे अन्न -धन से घर- द्वार
करूँ प्रणाम तुम्हें बारम्बार
हे सूर्यदेव ! जग के प्राणाधार !!
Ranjana Verma
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